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मृत्यु को जीत नहीं सकते, ऐसा मानना भ्रम भूलक है । ईश्वर की कृपा से मनुष्य मृत्युंजय बन सकता है तथा शरीर को इच्छानुसार धारण कर सकता है या छोड़ सकता है । भारत के प्रातः स्मरणीय ईश्वरानुरागी ऋषिवरों ने इसके लिए साधनाए की हैं । मृत्यु को जितने के लिये भारतवर्ष में योग के प्रयोग किये गए हैं और वे सफल भी हुए हैं ।

मृत्यु सब के लिये अनिवार्य है, मनुष्य मृत्यु का गुलाम है, इस बात का खंडन उन प्रयोगों ने किया है । मनुष्य अपनी दुर्बलता के कारण मृत्यु का दास एवं प्रकृति का गुलाम बना है । मनुष्य यदि चाहे तो अपनी शक्ति का विकास करके मृत्यु एवं प्रकृति का स्वामी बन सकता है । भारत के महान योगी इस अनुभव-सिद्ध विचार की विरासत समस्त मानवजाति के लिए छोड़ गये हैं ।

चांगदेव ने काल पर काबू रखने की कला हस्तगत कर के चौदह सौ वर्ष की आयु सिद्ध की थी तथा ज्ञानेश्वर के पास से शांति हासिल की थी । व्यास, नारद एवं हनुमान अमर माने जाते है और साधकों को आज भी दर्शन देते हैं । संत ज्ञानेश्वर ने जिन्दा समाधि ली थी और बाद में, लगभग तीन सौ साल के उपरान्त, महात्मा एकनाथ को अपने समाधि स्थान आलंदी में आने की प्रेरणा करके अपना दर्शन दिया था । ऐसे प्रसंग भारत के आध्यात्मिक इतिहास में अनेकों भरे पड़े हैं ।

योगी पुरुष केवल अपनी ही मृत्यु पर नहीं, बल्कि दूसरों की मृत्यु पर भी काबू रखते थे । जन्म एवं मरण पर उनका पूर्ण स्वामित्व था । यह बात नितांत सच है । आत्मा तो अमर है ही, किन्तु शरीर की अमरता के प्रयोग भी उन्होंने किये हैं । मृत्यु पर विजय प्राप्त करके मनुष्य बरसों तक जीवित रह सकता है, किन्तु लम्बे अर्से तक जीवित रहने के बाद भी उसे शरीर का त्याग तो करना ही पड़ता है न ? यह प्रश्न कुछ लोग पूछ उठेंगे । उन्हें याद रखना चाहिए कि मृत्यु को जिन्होंने जीत लिया है वे इच्छानुसार शरीर को धारण कर सकते हैं एवं छोड़ सकते हैं तथा शरीर में इच्छानुसार रह भी सकते हैं । ऐसा करने से लाभ होता है या नहीं, यह एक अलग बात है, किन्तु मानव के पुरुषार्थ की सिद्धि के इतिहास में मृत्यु की जीत का स्थान कुछ कम महत्वपूर्ण नहीं है ।

- © श्री योगेश्वर (गीता का संगीत)